राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल में बहुजन महापुरुषों की उपेक्षा ने बढ़ाई राजनीतिक गर्मी!

बहुजन और आदिवासी नायकों की उपेक्षा केवल भूल नहीं—राष्ट्रीय प्रेरणा की अवधारण को संकुचित करने वाली एक चिंताजनक प्रवृत्ति है।
संपादक— मनीष कुमार
उत्तर प्रदेश : भाजपा सरकार द्वारा 65 एकड़ भूमि पर करोड़ों रुपए की लागत से तैयार किया जा रहा ‘ लखनऊ में राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल’ 25 दिसंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों लोकार्पित होने जा रहा है। इस स्थल पर पण्डित श्यामा प्रसाद मुखर्जी, पण्डित दीनदयाल उपाध्याय और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी की 65 फीट ऊँची कांस्य प्रतिमाएँ स्थापित की जा रही हैं। सरकार इस परियोजना को ‘राष्ट्रनिर्माताओं को समर्पित प्रेरणा केंद्र’ बता रही है, लेकिन जैसे-जैसे इसके स्वरूप और चयन की सूची सामने आई है, विवाद और तीखा होता जा रहा है, क्योंकि इसे “राष्ट्रीय” नाम देने के बावजूद इसमें भारत के बहुजन, आदिवासी, दलित और सामाजिक क्रांतिकारियों की भूमिका को लगभग अनुपस्थित कर दिया गया है।
आलोचकों का कहना है कि यदि यह वास्तव में “राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल” है, तो इसमें डॉ. भीमराव अंबेडकर, महात्मा ज्योतिबा फूले, सावित्रीबाई फूले, ई.वी.रामासामी पेरियार, छत्रपति शाहूजी महाराज, बिरसा मुंडा, नारायण गुरु, गुरु घासीदास, रानी दुर्गावती, माता रमाई, झलकारी बाई, कांशीराम, बहूजन समाज के शिक्षण क्रांतिकारी भगत सिंह, रज्जू भैया पासी, माताजी मल्ली, भीखा जी कामा, डॉ. हेडगेवार, महात्मा गाँधी, डॉ. लोहिया, फातिमा शेख, बाबा चौथीराम, धीवर–कोल आदिवासी नायक, ऊदन सिंह नागवंशी, टंट्या भील, और वीरांगना उदा देवी पासी जैसे महापुरुषों और महापुरुषाओं को शामिल क्यों नहीं किया गया?
भारत का राष्ट्र-निर्माण किसी एक जाति, वर्ग, राजनीतिक धारा या सामाजिक पृष्ठभूमि का योगदान नहीं है, बल्कि यह सदियों से चले आ रहे संघर्षों—समानता के लिए लड़ाई, शिक्षा के विस्तार, जाति-विरोधी आंदोलनों और सामाजिक न्याय की मांग—का सामूहिक परिणाम है। ऐसे में बहुजन और आदिवासी महापुरुषों की अनदेखी केवल एक “चूक” नहीं, बल्कि एक “योजना” की तरह दिखाई देती है। सामाजिक विश्लेषकों का आरोप है कि यह स्मारक प्रेरणा से अधिक एक विचारधारा विशेष की सांस्कृतिक प्रस्तुति बनकर रह गया है, क्योंकि “राष्ट्रीय” शब्द का अर्थ विविधता, समावेश और व्यापक प्रतिनिधित्व से होता है, न कि किसी एक सामाजिक-राजनीतिक धारा के नेताओं के समूह से।
विपक्षी दलों का कहना है कि यह परियोजना भाजपा और आरएसएस के वैचारिक विस्तार का हिस्सा है, जिसमें राष्ट्र के बहुवर्णी इतिहास को पीछे धकेलकर केवल ‘एक खास सोच’ को स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। उनका आरोप है कि जब डॉ. अंबेडकर जैसे संविधान निर्माता, फूले–सावित्रीबाई जैसे शिक्षा-क्रांतिकारी, पेरियार जैसे जाति-विरोधी विचारक और आदिवासी नायक जैसे बिरसा मुंडा को स्थान नहीं मिलता, तो यह स्थल “राष्ट्रीय” कम और “चयनित विचारधारा का प्रेरणा केंद्र” अधिक दिखाई देता है। सरकार और आरएसएस की ओर से अब तक इस विवाद पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन बहुजन महापुरुषों की अनुपस्थिति ने यह प्रश्न बड़ा कर दिया है कि क्या शासन ‘राष्ट्र’ की प्रेरणा को संकुचित कर रहा है या उसे पुनर्परिभाषित करने की कोशिश कर रहा है?



एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ