नसीमुद्दीन सिद्दीकी की सपा में एंट्री: रणनीतिक मजबूरी या सियासी प्रयोग?

बसपा के भीतर अपने बड़े कद के बावजूद नसीमुद्दीन सिद्दीकी के संबंध पार्टी के अन्य नेताओं से खास मधुर नहीं रहे।
बहुजन समाज पार्टी की सरकार में कभी बेहद प्रभावशाली रहे नसीमुद्दीन सिद्दीकी एक बार फिर सियासी चर्चा के केंद्र में हैं। बसपा शासनकाल में उनके पास एक समय में 18 तक मंत्रालयों की जिम्मेदारी रही, जिससे उनकी संगठनात्मक क्षमता और प्रबंधन कौशल पर कोई सवाल नहीं उठता। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि वे कभी बड़े जनाधार वाले नेता नहीं माने गए। गोंडा से एक बार विधायक बनने के बाद वे कोई चुनाव जीत नहीं सके।
बसपा के भीतर अपने बड़े कद के बावजूद नसीमुद्दीन सिद्दीकी के संबंध पार्टी के अन्य नेताओं से खास मधुर नहीं रहे। कई नेताओं में उनके प्रति ईर्ष्या या असहजता की भावना रही, जिनमें से अनेक आज समाजवादी पार्टी में मजबूत स्थिति में हैं। यही वजह है कि उनकी सपा में भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
सियासी गलियारों में यह भी चर्चा है कि सपा ने उन्हें संभवतः आजम खान की कमी को आंशिक रूप से भरने के लिए आगे बढ़ाया है। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि सपा में पहले से स्थापित मुस्लिम लीडरशिप उन्हें किस हद तक स्वीकार करेगी। क्या वे संगठन में सामंजस्य बिठा पाएंगे या फिर उनकी मौजूदगी अंदरूनी संतुलन को प्रभावित करेगी—यह आने वाला वक्त ही बताएगा।
फिलहाल इतना तय है कि नसीमुद्दीन सिद्दीकी की सपा में एंट्री सिर्फ एक नेता का दल बदल नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर समीकरणों की एक नई परीक्षा है।
                                ---संपादक -मनीष कुमार 

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