क्या पंचायत की राजनीति अब समाज सेवा नहीं, बल्कि “सत्ता और संपत्ति का खेल” बन चुकी है?
शौचालय और आवास योजना में कमीशन खाने वाले चेहरे “ईमानदार” की छवि के साथ दीवारों पर मुस्कुराते दिख रहे हैं।
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव भले ही अभी महीनो दूर हों, लेकिन गांव-गांव में चुनावी सरगर्मी अभी से दिखने लगी है। गलियों से लेकर चौराहों तक, पोस्टर-बैनर और लुभावने वादों का दौर शुरू हो गया है। जो लोग कभी विकास के नाम पर गांव की अनदेखी करते थे, अब वही “जनसेवक” बनकर दरवाजे-दरवाजे नमस्कार कर रहे हैं।
लेकिन सवाल यह है — क्या यही असली लोकतंत्र है?
जो लोग कल तक गरीबों से शौचालय बनवाने में ₹2हजार और आवास योजना में ₹20 हजार तक कमीशन लेते थे, आज वही चेहरे “ईमानदार” की छवि के साथ दीवारों पर मुस्कुराते दिख रहे हैं। ये वही लोग हैं जिनके कार्यकाल में गांव की सड़कों में गड्ढे और नालियों में गंदगी भरी रहती थी।
आज फिर वही लोग “गांव का विकास”, “साफ-सुथरा प्रशासन” और “जनता की सेवा” के नारे लगाकर जनता के दिल में जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन असली मुद्दे — शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, और पारदर्शिता — चुनावी भाषणों में कहीं गुम हो गए हैं।
हर बार की तरह इस बार भी ग्रामीण मतदाता वादों की मिठास और झूठे आश्वासनों के बीच उलझा हुआ है। कोई बच्चों की पढ़ाई का मुद्दा नहीं उठाता, कोई बेरोजगार युवाओं की बात नहीं करता। पंचायत की राजनीति अब समाज सेवा नहीं, बल्कि “सत्ता और संपत्ति का खेल” बन चुकी है।
चुनाव जीतने के बाद तस्वीर बिल्कुल बदल जाती है। वही नेता जो “जनता का सेवक” कहलाते हैं, अब अपने परिवार और कुछ खास “चमचों” तक सीमित हो जाते हैं। जनता फिर पांच साल इंतजार करती है- अगली बार उसी धोखे को फिर से पहचानने के लिए।
लोकतंत्र की असली ताकत जनता के जागरूक होने में है, लेकिन जब मतदाता ही जात-पात, लालच या रिश्तेदारी के नाम पर वोट देगा, तो गांव में विकास कैसे आएगा?
अब समय है कि गांव का हर नागरिक खुद से सवाल करे —
क्या हम वोट उस व्यक्ति को देंगे जो पांच साल जनता के साथ खड़ा रहा, या उस व्यक्ति को जो सिर्फ चुनाव के वक्त “सेवा” का अभिनय कर रहा है? लोकतंत्र तभी सशक्त होगा जब जनता इन बनावटी मुस्कानों के पीछे छिपे स्वार्थ को पहचान लेगी। वरना हर पांच साल बाद यही सवाल फिर गूंजेगा —
👉 क्या यही असली लोकतंत्र है...?
(लेखक - मनीष कुमार)
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