भीमा कोरेगांव की लड़ाई: दलित स्वाभिमान और प्रतिरोध का ऐतिहासिक प्रतीक!


1 जनवरी, 1818 को लड़ी गई भीमा कोरेगांव की लड़ाई भारतीय इतिहास की उन निर्णायक घटनाओं में से एक है, जिसने सिर्फ़ सत्ता-संघर्ष की दिशा ही नहीं बदली, बल्कि सामाजिक न्याय और दलित स्वाभिमान के संघर्ष को भी एक सशक्त प्रतीक दिया। यह युद्ध तीसरे आंग्ल–मराठा युद्ध का हिस्सा था, जिसमें ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की एक छोटी टुकड़ी—जिसमें बड़ी संख्या में महार समुदाय के सैनिक शामिल थे—ने पेशवा बाजीराव द्वितीय की विशाल मराठा सेना का सामना किया। यह टकराव केवल सैन्य रणनीति का नहीं, बल्कि जातिगत भेदभाव, सामाजिक अन्याय और सत्ता के दमन के विरुद्ध प्रतिरोध का भी प्रतीक बन गया।
                इस लड़ाई के पीछे कई गहरे कारण थे। एक ओर, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में अपना प्रभुत्व बढ़ाना चाहती थी, वहीं मराठा साम्राज्य अपनी संप्रभुता बचाने के प्रयास में था। दूसरी ओर, पेशवा शासन के दौरान महार (दलित) समुदाय पर अत्याचार और अपमान अपने चरम पर था—उन्हें सामाजिक रूप से बहिष्कृत किया जाता था, गले में थूक का कलश और कमर में झाड़ू बाँधने जैसे अमानवीय नियम थोपे जाते थे, ताकि उनकी ‘छाया’ किसी सवर्ण को ‘अपवित्र’ न कर दे। ऐसे हालात में ब्रिटिश सेना में भर्ती होना महारों के लिए सामाजिक मुक्ति का अवसर बना, जहाँ उन्हें सम्मान, वेतन और सैन्य पहचान मिली—जो पेशवाई में संभव नहीं थी।
रणनीतिक रूप से भी हालात निर्णायक थे। पेशवा बाजीराव द्वितीय अपनी खोई हुई शक्ति वापस पाने की कोशिश कर रहे थे और इसी क्रम में अंग्रेजों से सीधा टकराव हुआ। कैप्टन फ्रांसिस स्टॉन्टन के नेतृत्व में 834 ब्रिटिश सैनिकों की एक छोटी टुकड़ी—जिसमें लगभग 500 महार सैनिक थे—ने भीमा नदी के तट पर, पुणे के पास, पेशवा की लगभग 28,000 सैनिकों की विशाल सेना का सामना किया। करीब 12 घंटे तक चले इस भीषण युद्ध में महार सैनिकों ने असाधारण साहस, अनुशासन और युद्ध-कौशल का प्रदर्शन किया। अंततः पेशवा की सेना को पीछे हटना पड़ा और अंग्रेजों को जीत मिली।
इस जीत का महत्व सैन्य परिणामों से कहीं आगे जाता है। दलित समुदाय इस दिन को ‘शौर्य दिवस’ के रूप में मनाता है—यह ब्राह्मणवादी वर्चस्व और जातिगत भेदभाव के खिलाफ़ प्रतिरोध, आत्म-सम्मान और सशक्तिकरण का प्रतीक है। भीमा कोरेगांव की विजय भारतीय इतिहास में जातिगत संबंधों के संदर्भ में एक महत्वपूर्ण मोड़ मानी जाती है, जिसने यह दिखाया कि सदियों से दमन झेलने वाले समुदाय भी संगठित होकर अन्याय को चुनौती दे सकते हैं। इस प्रकार, भीमा कोरेगांव की लड़ाई केवल अतीत की घटना नहीं, बल्कि न्याय, समानता और सम्मान के लिए जारी संघर्ष की जीवंत विरासत है।
    लेखक – मनीष कुमार

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