सपा की डगमगाती सियासत, AIMIM के बाद अब BSP बनी चुनौती, हफीज भारती के जाने से बढ़ी समाजवादी पार्टी की मुश्किलें।

हफीज भारती के बसपा में शामिल होने से सपा के अल्पसंख्यक वोट बैंक पर असर पड़ने की चर्चा तेज हो गई है।
लखनऊ : उत्तर प्रदेश की राजनीति में समाजवादी पार्टी (सपा) को एक के बाद एक झटके लगते नजर आ रहे हैं। AIMIM की सक्रियता के बाद अब बहुजन समाज पार्टी (बसपा) सपा के लिए नई राजनीतिक चुनौती बनकर उभर रही है। इसी क्रम में सपा को उस समय बड़ा झटका लगा, जब पार्टी के कद्दावर नेता और अल्पसंख्यक समुदाय में मजबूत पकड़ रखने वाले हफीज भारती ने सपा छोड़कर बसपा का दामन थाम लिया।
हफीज भारती ने 28 जनवरी 2026 को समाजवादी पार्टी से इस्तीफा देते हुए सपा की नीतियों और कार्यशैली पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि पार्टी अब अपने मूल सिद्धांतों और सामाजिक न्याय की विचारधारा से भटकती नजर आ रही है। बाराबंकी की सियासत में प्रभाव रखने वाले हफीज भारती का सपा से अलग होना पार्टी के लिए आगामी चुनावों के लिहाज से बड़ा झटका माना जा रहा है।
इस्तीफे के बाद हफीज भारती ने बसपा सुप्रीमो मायावती से मुलाकात कर पार्टी की सदस्यता ग्रहण की, जिसे बसपा में उनकी “घर वापसी” के तौर पर देखा जा रहा है। बसपा नेताओं का कहना है कि हफीज भारती जैसे अनुभवी नेता के आने से पार्टी को जमीनी स्तर पर मजबूती मिलेगी, खासकर अल्पसंख्यक और वंचित समाज के बीच।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि सपा से नेताओं का लगातार अलग होना पार्टी की डगमगाती सियासत की ओर इशारा कर रहा है। AIMIM पहले ही सपा के पारंपरिक वोट बैंक में सेंध लगा रही है और अब बसपा भी सक्रिय होकर पुराने नेताओं को जोड़ने में जुटी है। ऐसे में आने वाले समय में उत्तर प्रदेश की राजनीति में सपा की चुनौतियां और बढ़ सकती हैं, जबकि बसपा खुद को एक बार फिर मजबूत विकल्प के रूप में स्थापित करने की कोशिश में नजर आ रही है।

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