निष्ठा, रणनीति और संघर्ष से सत्ता की राजनीति में सतीश चंद्र मिश्रा की सफलता।
उत्तर प्रदेश की राजनीति में सतीश चंद्र मिश्रा का नाम बसपा के उस मजबूत आधार स्तंभ के रूप में लिया जाता है, जिसके बिना पार्टी की वैचारिक और संगठनात्मक संरचना की कल्पना अधूरी लगती है। उनकी राजनीतिक भूमिका केवल पदों तक सीमित नहीं रही, बल्कि उन्होंने बहुजन आंदोलन को सामाजिक संतुलन, रणनीतिक समझ और वैचारिक मजबूती प्रदान की है।
मायावती ने सतीश चंद्र मिश्रा को राजनीति में आगे बढ़ाया और उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण समाज के सबसे प्रभावशाली, विश्वसनीय और ताकतवर नेताओं के रूप में स्थापित किया। उन्होंने न केवल ब्राह्मण समाज को बसपा से जोड़ने का कार्य किया, बल्कि यह संदेश भी दिया कि बहुजन राजनीति किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि सभी समाजों को साथ लेकर चलने की विचारधारा है। सतीश चंद्र मिश्रा बसपा के उन विरले नेताओं में शामिल हैं, जिन्होंने कठिन से कठिन राजनीतिक दौर में भी पार्टी और नेतृत्व के प्रति अपनी निष्ठा को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। जब राजनीतिक लाभ, सत्ता की लालसा और व्यक्तिगत स्वार्थ के कारण कई नेता पार्टी छोड़कर अन्य दलों का दामन थाम चुके थे, तब भी सतीश मिश्रा मजबूती से मायावती के साथ खड़े रहे। उनका यह रुख बताता है कि राजनीति उनके लिए अवसरवाद नहीं, बल्कि सिद्धांतों और प्रतिबद्धता का मार्ग है।
राजनीति के सफर में उन्हें भी अनेक बड़े प्रस्ताव और आकर्षक अवसर मिले, लेकिन न तो उनका ईमान डिगा और न ही उनका संकल्प कमजोर पड़ा। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि सच्चा नेता वही होता है जो परिस्थितियों के दबाव में भी अपने मूल्यों से समझौता न करे। बहुजन आंदोलन और ब्राह्मण समाज के बीच सेतु का कार्य करते हुए सतीश चंद्र मिश्रा ने सामाजिक समरसता की राजनीति को मजबूती दी। उनका व्यक्तित्व और राजनीतिक आचरण बसपा की उस सोच को दर्शाता है, जिसमें सामाजिक न्याय, समानता और सम्मान की भावना निहित है। आज जब उत्तर प्रदेश की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है, तब सतीश चंद्र मिश्रा और मायावती की जोड़ी से कार्यकर्ताओं और समर्थकों को बड़ी उम्मीदें हैं। यह आशा की जाती है कि 2027 के विधानसभा चुनाव में दोनों मिलकर बसपा को पुनः सत्ता में लाने का कार्य करेंगे और उत्तर प्रदेश की राजनीति में बहुजन आंदोलन को नई दिशा और नई ऊर्जा प्रदान करेंगे।
(संपादक- मनीष कुमार)
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