उत्तर प्रदेश की राजनीति में बदलती ज़मीनी हकीकत!

सपा–कांग्रेस गठबंधन भाजपा को सत्ता से हटाने में सक्षम नहीं दिखता। 
लखनऊ : उत्तर प्रदेश की सियासत में ज़मीन पर बड़ा बदलाव साफ़ दिखाई देने लगा है। खासकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम वोटर का रुझान अब पुराने राजनीतिक पैटर्न से बाहर निकलकर नई और व्यावहारिक राजनीतिक सोच की ओर बढ़ रहा है। यह बदलाव भावनाओं से नहीं, बल्कि ठोस राजनीतिक गणित और भविष्य की ज़िम्मेदारी के एहसास से प्रेरित है। ज़मीन पर यह चर्चा आम है कि सपा–कांग्रेस गठबंधन भाजपा को सत्ता से हटाने में सक्षम नहीं दिखता। मुस्लिम समाज खुलकर यह कहने लगा है कि यह गठबंधन मुख्य रूप से यादव और मुस्लिम वोटों तक सीमित है, जो कुल मिलाकर लगभग 27 प्रतिशत के आसपास बैठता है। जबकि सत्ता परिवर्तन के लिए कम से कम 40 प्रतिशत वोटों की मज़बूत और संगठित एकजुटता अनिवार्य मानी जाती है।
इसी के साथ एक और सच्चाई भी सामने आ रही है कि दलित वोटर सपा–कांग्रेस गठबंधन के साथ जाने को तैयार नहीं है। पिछले अनुभवों ने दलित समाज में यह धारणा मज़बूत की है कि उनके हितों और राजनीतिक हिस्सेदारी की वास्तविक गारंटी सपा–कांग्रेस के पास नहीं है। ऐसे में दलित और मुस्लिम की निर्णायक एकता केवल बहुजन समाज पार्टी या BSP के नेतृत्व वाले किसी व्यापक गठबंधन में ही संभव मानी जा रही है।
मुस्लिम समाज के भीतर यह भावना तेज़ी से उभर रही है कि BSP को AIMIM के साथ आकर एक नया सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तैयार करना चाहिए, साथ ही कांग्रेस से दूरी बनाकर एक मज़बूत और स्वतंत्र बहुजन गठबंधन खड़ा करना चाहिए। उनका मानना है कि यही रास्ता भाजपा को वास्तविक चुनौती दे सकता है और उत्तर प्रदेश में एक वैकल्पिक सरकार की संभावना पैदा कर सकता है।
अब जनता केवल नारों और भावनात्मक अपील से संतुष्ट नहीं है। वोटर यह सवाल कर रहा है कि कौन वास्तव में भाजपा को रोक सकता है और कौन सत्ता परिवर्तन का भरोसेमंद विकल्प दे सकता है। राजनीति अब भाषणों की नहीं, बल्कि ज़मीनी गणित, सामाजिक एकता और दूरदर्शी रणनीति की मांग कर रही है।
आज सवाल यह नहीं है कि कौन ज़्यादा बोलता है,
सवाल यह है कि कौन भाजपा को रोक सकता है।
जनता बदलाव चाहती है —
लेकिन मज़बूत विकल्प के साथ।

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