मुंबई नगर निगम चुनाव: एआईऍमआईऍम ने दिखाया राजनीतिक दम, सपा की रणनीति हुई फेल।

बाहरी चेहरों की सियासत फेल, मुंबई ने दिखाई ज़मीनी हक़ीक़त!
मुस्लिम नेतृत्व पर जनता की मुहर: ओवैसी बने भरोसे का नाम! 
लेखक-मनीष कुमार 
 मुंबई नगर निगम चुनाव ने एक बार फिर यह साफ कर दिया है कि देश की सियासत अब नामों और बाहरी चेहरों से नहीं, बल्कि ज़मीनी पकड़ और भरोसे से तय होती है। इस चुनाव में एआईऍमआईऍम ने समाजवादी पार्टी (सपा) को न केवल करारी शिकस्त दी, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि मुस्लिम नेतृत्व के सवाल पर जनता किसके साथ खड़ी है।
समाजवादी पार्टी ने एआईऍमआईऍम को चुनौती देने के लिए उत्तर प्रदेश से “खचाखच भरे स्टार नेता” मुंबई भेजे। बड़े-बड़े भाषण हुए, मंच सजे, लेकिन नतीजा शून्य रहा। मुंबई की जनता ने साफ संदेश दे दिया—बाहरी प्रयोगों की यहाँ कोई जगह नहीं। जिन नेताओं को एआईऍमआईऍम को हराने के लिए भेजा गया था, उन्हें जनता ने बैरंग लौटा दिया।
इस चुनाव का सबसे बड़ा संदेश यह रहा कि मुस्लिम समाज का भरोसा आज भी एआईऍमआईऍम और उसके नेता जनाब असदुद्दीन ओवैसी के साथ है। ओवैसी केवल भाषणों के नेता नहीं, बल्कि हक़ और हुकूक़ की सियासत करने वाले नेता के रूप में पहचाने जाते हैं। चाहे संसद हो या सड़क, एआईऍमआईऍम ने हमेशा अपने मतदाताओं की आवाज़ मजबूती से उठाई है, और मुंबई की जनता ने इसी निरंतरता पर मुहर लगाई है। इसके उलट, समाजवादी पार्टी की राजनीति अब सीमित दायरे में सिमटती दिख रही है। मुंबई में मिली हार ने यह संकेत दे दिया है कि केवल पुरानी पहचान और उत्तर प्रदेश की राजनीति का सहारा लेकर दूसरे राज्यों में पकड़ बनाना आसान नहीं। जनता अब विकल्प देख रही है, और एआईऍमआईऍम उस विकल्प के रूप में मजबूती से उभर रही है। अब सवाल केवल मुंबई तक सीमित नहीं है। अगर समाजवादी पार्टी अपनी रणनीति और नेतृत्व पर गंभीर मंथन नहीं करती, तो उत्तर प्रदेश में भी उसका राजनीतिक वजूद और कमजोर हो सकता है। जनता बदलाव के मूड में है और वह उसी के साथ खड़ी हो रही है जो खुलकर, बेझिझक और मजबूती से उनकी बात करता है।
निष्कर्ष-----
मुंबई नगर निगम चुनाव सिर्फ एक स्थानीय चुनाव नहीं था, बल्कि यह आने वाली राजनीति का संकेतक है। एआईऍमआईऍम ने साबित कर दिया कि नेतृत्व ज़मीनी संघर्ष से बनता है, न कि बाहरी प्रयोगों से। और यह संदेश अब पूरे देश की राजनीति में गूंज रहा है।

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