जहां सपा पर धर्म-जाति की राजनीति के आरोप हैं, वहीं मायावती राष्ट्रीय मुद्दों पर मुखर दिख रही हैं। इसे बसपा के लिए सकारात्मक संकेत माना जा रहा है।
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में हैं। उनके 70वें जन्मदिन पर दिए गए बयान, जिसमें उन्होंने ब्राह्मण समाज का उल्लेख किया था, के बाद 15 जनवरी से राष्ट्रीय मीडिया में लगातार बहस का दौर जारी है। टीवी चैनलों और डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर मायावती के शब्दों के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह उनके राजनीतिक कद और उनके हर बयान के प्रभाव को दर्शाता है। इसी बीच राजनीतिक हलकों और आम जनता के बीच यह चर्चा भी सामने आ रही है कि जहां एक ओर समाजवादी पार्टी पर धर्म और जाति की राजनीति करने के आरोप लगते हैं, वहीं मायावती राष्ट्रहित, शिक्षा, रोजगार और संविधान से जुड़े मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखती रही हैं। लोगों का कहना है कि मायावती हर मुद्दे पर स्पष्ट पक्ष रखती हैं, जिससे उनका नेतृत्व अलग पहचान बनाता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि इसी वजह से आने वाले समय में बसपा का जनाधार और मजबूत हो सकता है। खासकर युवा वर्ग में शिक्षा और रोजगार जैसे मुद्दों को लेकर उनकी सोच को समर्थन मिल रहा है। वहीं दूसरी ओर, सियासी गलियारों में यह बहस भी जारी है कि बसपा को भाजपा के खिलाफ किस तरह की रणनीति अपनानी चाहिए। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि पार्टी आने वाले समय में सक्रिय और निर्णायक भूमिका में नजर आती है, तो वह एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीति में मजबूती से उभर सकती है।
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