अखिलेश के बयान से सियासत में हलचल, क्या सपा–भाजपा के बीच बन रही है नई राजनीतिक ज़मीन?

अर्पणा यादव की भूमिका पर भी उठे सवाल, गठबंधन की अटकलें तेज।
मुलायम सिंह यादव के पुराने बयान को जोड़कर फिर चर्चा में आया ‘मोदी समर्थन’।
लखनऊ। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव के हालिया बयान के बाद प्रदेश की राजनीति में नई हलचल पैदा हो गई है। मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर संकेत, दोनों डिप्टी सीएम को कथित ऑफर और “100 विधायकों” की शर्त ने राजनीतिक गलियारों में यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या आने वाले समय में समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी के बीच कोई नई राजनीतिक समझ या अप्रत्याशित गठबंधन बन सकता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव का यह बयान सामान्य विपक्षी रणनीति से अलग प्रतीत होता है। खास तौर पर यह बात कि मुख्यमंत्री का चेहरा सपा से नहीं बल्कि भाजपा खेमे से भी हो सकता है, ने सियासी चर्चाओं को और हवा दी है।
अर्पणा यादव और धर्मेंद्र यादव की भूमिका पर नजर-
इन अटकलों को उस समय और बल मिला जब सपा परिवार से जुड़ीं और वर्तमान में भाजपा नेत्री अर्पणा यादव की सक्रियता को इस घटनाक्रम से जोड़कर देखा जाने लगा। वहीं, सपा के वरिष्ठ नेता रहे धर्मेंद्र यादव के बहनोई और भाजपा से जुड़े धर्मेंद्र यादव की राजनीतिक भूमिका को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं। सवाल उठाए जा रहे हैं कि क्या इन नेताओं के माध्यम से दोनों दलों के बीच संवाद या समीकरण साधने की कोशिश हो रही है।
हालांकि, इस संबंध में किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन सियासी हलकों में इसे संभावनाओं के तौर पर देखा जा रहा है, न कि किसी घोषित रणनीति के रूप में।
मुलायम सिंह यादव के बयान की फिर चर्चा-
इसी बीच, समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का संसद भवन में दिया गया पुराना बयान भी एक बार फिर चर्चा में आ गया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि वह नरेंद्र मोदी को फिर से प्रधानमंत्री बनते देखना चाहते हैं। उस वक्त यह बयान राजनीतिक हलकों में चौंकाने वाला माना गया था, और अब मौजूदा घटनाक्रम से जोड़कर इसे फिर से विश्लेषण का विषय बनाया जा रहा है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि इन सभी बयानों और घटनाओं को एक साथ देखने पर सपा और भाजपा के बीच किसी बड़े राजनीतिक प्रयोग की अटकलें स्वाभाविक हैं। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि यह सब महज बयानबाज़ी और रणनीतिक दबाव की राजनीति है या वास्तव में भविष्य की किसी नई राजनीतिक संरचना का संकेत।
फिलहाल, दोनों ही दल सार्वजनिक रूप से गठबंधन की किसी संभावना से इनकार कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक माहौल में उठे इन सवालों ने प्रदेश की राजनीति को एक बार फिर गर्मा दिया है। सभी की निगाहें अब आने वाले दिनों में सपा और भाजपा के अगले कदम पर टिकी हुई हैं।

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