भगवान शिव सृजन और संहार के प्रतीक, विवेक व वैराग्य का अद्भुत संगम।
संवाददाता -अबुल कैश
निजामाबाद, आजमगढ़। सहस्र नामों से प्रसिद्ध भगवान शिव अजन्मे हैं और देवों के भी देव माने जाते हैं। शिव में विवेक और वैराग्य दोनों का पूर्ण समावेश है। कहा जाता है कि शिव नाम का निरंतर स्मरण करने से विवेक का तृतीय नेत्र स्वतः जागृत हो जाता है। शिव ही सृजन और संहार के मूल आधार हैं, जिनमें शास्त्र और संस्कृति दोनों समाहित हैं।
फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को मनाया जाता है महाशिवरात्रि का पावन पर्व।
महाशिवरात्रि भगवान शिव के लिंग रूप में उद्भव के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। इसे पुण्यदायिनी और मुक्ति प्रदान करने वाली रात्रि भी कहा गया है। यह महापर्व फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाया जाता है, जिसका महत्व सभी पुराणों में वर्णित है। इस दिन श्रद्धालु व्रत रखते हैं और शिव महिमा का गुणगान करते हैं।
दिखावे से परे, आत्मिक साधना का पर्व है महाशिवरात्रि।
महाशिवरात्रि केवल बाहरी आडंबर या परंपरा का पर्व नहीं, बल्कि यह एक अत्यंत विशिष्ट और आध्यात्मिक साधना का अवसर है। शिव को महाकाल कहा गया है और परमेश्वर के तीन रूपों में से एक रूप की उपासना का यह विशेष दिन माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव ने ब्रह्मा के भद्र रूप में अवतार लिया था। वहीं एक अन्य मान्यता के अनुसार प्रलय काल में भगवान शिव अपने तांडव से समस्त ब्रह्मांड का संहार करते हैं, इसी कारण इसे कालरात्रि भी कहा जाता है।
शिव सृष्टि के विनाश और पुनः स्थापना के बीच सेतु का कार्य करते हैं। मानवीय अज्ञान में बंधे जीव की अंतिम परिणति शिवत्व और शिवतत्व में समर्पण मानी गई है। साधक की अंतःकरण से उठने वाली यही पुकार उसे भगवान शिव के कल्याणकारी स्वरूप का दर्शन कराती है। इसी आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए महाशिवरात्रि का पर्व श्रद्धा, भक्ति और साधना के साथ उत्सव रूप में मनाया जाता है।
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