अपने -अपने अम्बेडकर जयंती पर सियासी दावेदारी तेज, 2027 से पहले दलित राजनीति में घमासान।

सपा, भाजपा और कांग्रेस पर उठे सवाल—क्या अम्बेडकर का नाम सिर्फ चुनावी हथियार?
नई दिल्ली :  डॉ भीमराव अम्बेडकर जयंती 2026 के मौके पर उत्तर प्रदेश की राजनीति में जबरदस्त हलचल देखने को मिल रही है। हर बड़ा दल बाबा साहेब के नाम पर कार्यक्रम, रैलियां और घोषणाएं कर रहा है, लेकिन साथ ही विपक्ष और सियासी विश्लेषक यह सवाल भी उठा रहे हैं कि क्या यह सम्मान वास्तविक है या केवल चुनावी रणनीति का हिस्सा।
समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव को लेकर विरोधियों का आरोप है कि पहले लखनऊ के आंबेडकर पार्क को लेकर विवादित बयान दिए गए और आंबेडकर के नाम पर बने जिले का नाम बदलने जैसे फैसले लिए गए, लेकिन अब जयंती के मौके पर बड़े स्तर पर कार्यक्रम कर राजनीतिक संदेश देने की कोशिश हो रही है।
वहीं भारतीय जनता पार्टी पर भी निशाना साधा जा रहा है। आलोचकों का कहना है कि एक ओर सरकार संविधान की बात करती है, वहीं दूसरी ओर बुलडोजर कार्रवाई जैसे कदमों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। इसके बावजूद भाजपा भी अब आंबेडकर जयंती को बड़े स्तर पर मनाने और दलित समाज के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम कर रही है।
कांग्रेस भी इस सियासी घेराबंदी से अछूती नहीं है। विपक्षी दलों का आरोप है कि कांग्रेस ने अपने शासनकाल में बाबा साहेब को वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे, जबकि अब चुनावी माहौल में पार्टी आंबेडकर के नाम और विचारों को प्रमुखता से सामने ला रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आंबेडकर जयंती अब सिर्फ श्रद्धांजलि का अवसर नहीं, बल्कि दलित वोट बैंक को साधने की खुली प्रतिस्पर्धा बन चुकी है। ऐसे में यह सवाल और भी अहम हो जाता है कि किस पार्टी ने वास्तव में आंबेडकर के विचारों को जमीन पर उतारने का काम किया।
 बहुजन समाज पार्टी और मायावती के नेतृत्व में दलित समाज को सीधे सत्ता में भागीदारी और राजनीतिक पहचान मिली, जिसे बसपा अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बताती है। वहीं अन्य दलों ने भी अलग-अलग तरीकों से इस वर्ग को अपने साथ जोड़ने की कोशिश की है।
अब नजर 2027 के चुनाव पर है, जहां यह तय होगा कि दलित समाज किसके दावों पर भरोसा करता है—विचार, काम या फिर चुनावी वादे।

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