‘अफसर मेरी सुनते ही नहीं’—ओमप्रकाश राजभर का छलका दर्द, विभागीय अफसरों से ठनी तो उठे कई सवाल।

कैबिनेट मंत्री की नाराजगी के सियासी मायने क्या? क्या सत्ता में हिस्सेदारी के बावजूद विभाग पर पकड़ को लेकर असंतोष, 2027 के विधानसभा चुनाव में बदल सकता है समीकरण?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति में कैबिनेट मंत्री और सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) के प्रमुख ओमप्रकाश राजभर के एक बयान ने सियासी हलकों में चर्चा तेज कर दी है। विभागीय अधिकारियों को लेकर उनका यह कहना कि “अफसर मेरी सुनते ही नहीं” कई सवाल खड़े करता है। मंत्री के इस कथित दर्द को केवल एक विभागीय नाराजगी मानकर नजरअंदाज किया जाए या इसके पीछे सत्ता के भीतर अधिकार, निर्णय लेने की क्षमता और प्रशासनिक नियंत्रण से जुड़े बड़े सवाल हैं—इस पर अब राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
राजभर लंबे समय से पिछड़े, अति पिछड़े और सामाजिक रूप से वंचित वर्गों की राजनीति को लेकर मुखर रहे हैं। ऐसे में जब सरकार में कैबिनेट मंत्री के तौर पर जिम्मेदारी संभाल रहे नेता खुद अधिकारियों के रवैये को लेकर सार्वजनिक रूप से असंतोष जाहिर करते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठता है कि मंत्री और विभागीय मशीनरी के बीच तालमेल में आखिर कमी कहां है?
‘मलाई बांटने’ वाली राजनीति पर भी उठे सवाल-
राजनीतिक चर्चाओं में सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर अक्सर यह सवाल उठता रहा है कि सहयोगी दलों को सरकार में पद तो मिल जाते हैं, लेकिन क्या उन्हें अपने विभागों में अपेक्षित प्रशासनिक स्वतंत्रता और प्रभाव भी मिलता है? राजभर के बयान को इसी व्यापक राजनीतिक संदर्भ में देखा जा रहा है।
हालांकि, यह कहना कि किसी मंत्री को जानबूझकर केवल पद दिया गया है और अधिकारियों को उनका काम न करने के निर्देश दिए गए हैं, बिना ठोस प्रमाण के एक राजनीतिक अनुमान होगा। इसके पीछे विभागीय स्तर पर अधिकारियों और मंत्री के बीच मतभेद, निर्णय प्रक्रिया, प्रशासनिक अधिकारों की सीमाएं या किसी खास मामले को लेकर असहमति जैसे कई कारण हो सकते हैं।
राजभर के लिए यह सिर्फ नाराजगी नहीं, राजनीतिक संदेश भी हो सकता है?
ओमप्रकाश राजभर की राजनीति का आधार पूर्वांचल समेत प्रदेश के पिछड़े और अति पिछड़े वर्गों में उनका प्रभाव रहा है। इसलिए उनका कोई भी सार्वजनिक बयान केवल व्यक्तिगत नाराजगी के तौर पर नहीं देखा जाता। अगर मंत्री लगातार यह संदेश देते हैं कि उनकी बात अधिकारी नहीं सुन रहे हैं, तो इससे उनके समर्थकों के बीच यह सवाल उठ सकता है कि सरकार में उनकी वास्तविक भूमिका कितनी प्रभावी है?
यही बिंदु 2027 के विधानसभा चुनाव की राजनीति में महत्वपूर्ण हो सकता है। सहयोगी दलों के नेता यदि अपने समर्थक वर्ग को यह भरोसा दिलाने में सफल रहते हैं कि सत्ता में उनकी भागीदारी से उनके मुद्दों को प्राथमिकता मिली, तो गठबंधन को राजनीतिक लाभ मिल सकता है। इसके उलट यदि कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच यह धारणा बनने लगे कि मंत्री के पास पद तो है, लेकिन फैसलों पर प्रभाव सीमित है, तो इसका असर संगठन और वोट बैंक दोनों पर पड़ सकता है।
2027 में राजभर का रुख कितना महत्वपूर्ण?
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को देखते हुए राजभर की भूमिका इसलिए भी अहम है क्योंकि पूर्वांचल के कई विधानसभा क्षेत्रों में पिछड़ा और अति पिछड़ा मतदाता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। ऐसे में मंत्री का असंतोष यदि आगे बढ़कर सरकार में अधिकार और हिस्सेदारी के सवाल में बदलता है, तो विपक्ष को सरकार पर हमला करने का राजनीतिक मुद्दा मिल सकता है।
दूसरी ओर, यदि सरकार और राजभर के बीच बातचीत से विभागीय स्तर की समस्याएं दूर हो जाती हैं और मंत्री अपने क्षेत्र तथा समर्थकों के सामने कामकाज की उपलब्धियां रखने में सफल होते हैं, तो मौजूदा विवाद का चुनावी असर सीमित भी रह सकता है।
‘अफसर मेरी सुनते ही नहीं’ से बड़ा सवाल—क्या गठबंधन में सब ठीक है?
राजभर के बयान ने फिलहाल एक सवाल जरूर खड़ा कर दिया है—क्या सरकार में सहयोगी दलों के मंत्रियों को अपने विभागों में पूरी तरह प्रभावी ढंग से काम करने का अवसर मिल रहा है? यह सवाल आने वाले समय में और बड़ा हो सकता है, खासकर तब जब 2027 का चुनाव करीब आएगा और सभी दल अपने-अपने सामाजिक समीकरण मजबूत करने में जुटेंगे।
फिलहाल राजभर के बयान को लेकर राजनीतिक अटकलें तेज हैं। यह नाराजगी विभागीय अधिकारियों तक सीमित रहती है या आगे चलकर सत्ता में हिस्सेदारी, अधिकार और 2027 के चुनावी गठबंधन का मुद्दा बनती है, यह आने वाले दिनों की राजनीतिक गतिविधियों से स्पष्ट होगा।

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