आज़मगढ़: भाजपा सरकार में उपेक्षा की शिकार डॉ. भीमराव अंबेडकर लाइब्रेरी।

10 विधायक और 2 सांसद वाले ज़िले में न लाइब्रेरी की आवाज़, न सरकार से सवाल — क्या सपा का दलित प्रेम सिर्फ दिखावा?
आज़मगढ़। जनपद के सुखदेव पहलवान स्टेडियम के पास 1995 में जिस डॉ. भीमराव अंबेडकर लाइब्रेरी का शिलान्यास हुआ था, आज वह इमारत नहीं, बल्कि एक खंडहर बन चुकी है। दीवारों से प्लास्टर गिर रहा है, छत से पानी रिसता है, खिड़कियों के शीशे टूटे हुए हैं और अंदर न तो रोशनी की व्यवस्था है, न पंखे, न पीने का पानी और न ही शौचालय। सबसे दर्दनाक सच यह है कि लाइब्रेरी तो बनी, परंतु अभी तक उसमें किताबें नहीं आ सकीं। जिस भवन को दलित, पिछड़े और गरीब छात्रों के लिए ज्ञान का केंद्र बनना था, वह आज कूड़े-कर्कट, जंगली घास और सन्नाटे का शिकार है। स्थानीय निवासी बताते हैं कि कभी-कभी कोई सामाजिक संगठन या छात्र समूह वहां जाता है तो बस तस्वीरें खींचकर चला जाता है, लेकिन न तो ज़िला प्रशासन ने इस लाइब्रेरी को चालू करने की कोशिश की, न ही किसी जनप्रतिनिधि ने विधानसभा या लोकसभा में इस मुद्दे को उठाया। शिक्षा के लिए बनी लाइब्रेरी की भी आवाज़ न उठ सके, तो ऐसे जनप्रतिनिधियों की क्या आवश्यकता? यह सवाल आज़मगढ़ के छात्रों, युवाओं और स्थानीय लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आज़मगढ़ ज़िले से 10 विधायक और दो सांसद समाजवादी पार्टी के हैं, जो लगातार डॉ. अंबेडकर के नाम पर भाषण देते हैं, रैलियों में उनकी तस्वीरें लगाते हैं और दलित वोट बैंक की राजनीति करते हैं, लेकिन ज़मीन पर अंबेडकर के विचारों से जुड़ी इस लाइब्रेरी की बदहाली पर एक शब्द नहीं बोलते। न विधानसभा में कोई प्रश्नकाल में सवाल किया गया, न लोकसभा में कोई शून्यकाल में मुद्दा उठा, न ज़िला प्रशासन को कोई पत्र लिखा गया और न ही जनसुनवाई में इस लाइब्रेरी के सुधार की मांग रखी गई। सपा के स्थानीय नेता अंबेडकर जयंती पर माल्यार्पण, रैली और पोस्टर जरूर लगाते हैं, लेकिन लाइब्रेरी की दीवारों से गिरता प्लास्टर, टूटी खिड़कियां और खाली पड़े कमरे उनकी आंखों को क्यों नहीं दिखते? क्या दलित प्रेम सिर्फ रैलियों, भाषणों और पोस्टरों तक सीमित है, लेकिन लाइब्रेरी, स्कूल, छात्रवृत्ति, कोचिंग जैसे ठोस मुद्दों पर नहीं? जब 10 विधायक और दो सांसद मिलकर भी एक लाइब्रेरी की आवाज़ नहीं उठा सकते, तो ऐसे जनप्रतिनिधियों की क्या आवश्यकता? यह सवाल उन सभी जनप्रतिनिधियों से है, जो शिक्षा, सामाजिक न्याय और डॉ. भीमराव अंबेडकर के विचारों की बात करते हैं। छात्रों के लिए लाइब्रेरी केवल किताबें रखने की जगह नहीं होती, बल्कि प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, ज्ञान प्राप्त करने और बेहतर भविष्य बनाने का माध्यम होती है।
दूसरी तरफ, योगी आदित्यनाथ की भाजपा सरकार ने 2026 में 403 करोड़ रुपये की “डॉ. अंबेडकर मूर्ति विकास योजना” शुरू की है, जिसके तहत 403 विधानसभा क्षेत्रों में अंबेडकर की प्रतिमाओं का सौंदर्यीकरण और विकास किया जाएगा। सरकार का दावा है कि वह अंबेडकर के विरासत को सम्मान दे रही है, लेकिन आज़मगढ़ जैसी जगह पर अंबेडकर लाइब्रेरी जैसे ज्ञान केंद्र की उपेक्षा हो रही है। विपक्ष कहता है कि भाजपा प्रतीकात्मक राजनीति (मूर्ति, उद्घाटन, नामकरण) पर ज़्यादा ध्यान देती है, लेकिन शिक्षा, लाइब्रेरी, छात्रवृत्ति, रोज़गार जैसे असली मुद्दों पर कम। आज़मगढ़ की अंबेडकर लाइब्रेरी का मामला एक बड़ा सवाल खड़ा करता है: क्या समाजवादी पार्टी सिर्फ अंबेडकर के नाम पर वोट लेना चाहती है, लेकिन ज़मीन पर उनके विचारों से जुड़े संस्थानों की परवाह नहीं करती? क्या भाजपा सरकार भी अंबेडकर के नाम पर सिर्फ मूर्ति और उद्घाटन की राजनीति कर रही है, जबकि अंबेडकर के विचारों से जुड़े ज्ञान केंद्र उपेक्षित हैं? स्थानीय दलित और पिछड़े वर्ग के छात्र कहते हैं: “हमसे वोट मांगते वक्त सब अंबेडकर-अंबेडकर करते हैं, लेकिन हमारी लाइब्रेरी की हालत किसी को नहीं दिखती। न सपा ने आवाज़ उठाई, न भाजपा सरकार ने सुधारा।” स्थानीय सामाजिक संगठन, छात्र और बुद्धिजीवी मांग कर रहे हैं कि उत्तर प्रदेश सरकार तुरंत इस लाइब्रेरी का जीर्णोद्धार करवाए। भवन की मरम्मत, रोशनी, पंखे, पीने का पानी, शौचालय, नई किताबें, अंबेडकर साहित्य, दलित साहित्य और सामाजिक न्याय से जुड़े संदर्भ ग्रंथ उपलब्ध कराए जाएं। साथ ही डिजिटल लाइब्रेरी बनाई जाए, जिसमें कंप्यूटर, इंटरनेट, ई-बुक और ऑनलाइन रिसर्च की सुविधा हो। सपा के 10 विधायक और 2 सांसद इस मुद्दे को विधानसभा-लोकसभा में उठाएं तथा स्थानीय प्रशासन के साथ बैठक कर लाइब्रेरी के सुधार की योजना बनाएं। ज़िला प्रशासन लाइब्रेरी की वर्तमान स्थिति की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करे और सुधार की समय-सीमा तय करे। आज़मगढ़ की डॉ. भीमराव अंबेडकर लाइब्रेरी सिर्फ एक इमारत नहीं, बल्कि एक प्रतीक है। जब तक सपा और भाजपा दोनों इस लाइब्रेरी की उपेक्षा पर ठोस जवाब नहीं देते, तब तक यह सवाल बना रहेगा: “क्या अंबेडकर का नाम सिर्फ वोट बैंक के लिए है, या उनके विचारों से जुड़े संस्थानों के लिए भी?”

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